FIR के बाद जाँच में देरी पर कोर्ट जाने की जानकारी दर्शाता सांकेतिक चित्र, जिसमें अदालत, आवेदन फाइल और न्याय का तराजू है।

FIR के बाद पुलिस जाँच में देरी हो तो क्या करें? शिकायतकर्ता के लिए कोर्ट जाने की जानकारी

ABR NEWS | LEGAL INFORMATION

FIR के बाद जाँच में कार्रवाई न हो तो शिकायतकर्ता कोर्ट कैसे जाए?

FIR दर्ज होने के बाद महत्वपूर्ण साक्ष्यों की जाँच नहीं हो रही हो, तो शिकायतकर्ता संबंधित Judicial Magistrate के सामने उचित जाँच के निर्देश माँग सकता है।

केवल forensic audit नहीं कराने से अपने-आप IO की लापरवाही साबित नहीं होती। आवेदन में स्पष्ट करना जरूरी है कि कौन-सा महत्वपूर्ण साक्ष्य छूट रहा है और उसका महत्व क्या है।

1. IO और थाना प्रभारी को लिखित आवेदन दें

FIR नंबर, तारीख और लंबित जाँच का विवरण लिखें। उदाहरण के लिए: संबंधित bank statements नहीं मँगाए गए, UTR का मिलान नहीं हुआ या digital records सुरक्षित नहीं किए गए। आवेदन की प्राप्ति या delivery का प्रमाण सुरक्षित रखें।

2. वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को शिकायत भेजें

संबंधित SP/DCP या EOW के वरिष्ठ अधिकारी को पहले दिए गए आवेदन और उनके प्रमाण भेजें। देरी से साक्ष्य नष्ट होने का जोखिम हो तो उसका स्पष्ट उल्लेख करें।

3. संबंधित Magistrate के सामने आवेदन करें

वकील के माध्यम से उचित जाँच के निर्देश और आवश्यक न्यायिक निगरानी की माँग की जा सकती है। BNSS लागू मामलों में धारा 175(3) के अंतर्गत उपयुक्त आवेदन का आधार और प्रक्रिया FIR तथा कार्यवाही की स्थिति के अनुसार तय करें। पुराने लंबित मामलों में CrPC लागू रह सकती है।

आवेदन के साथ कौन-से दस्तावेज लगाएँ?

  • FIR की कॉपी और घटनाओं की तारीखवार सूची।
  • IO तथा वरिष्ठ अधिकारियों को दिए आवेदन और प्राप्ति प्रमाण।
  • Payment records, agreements, receipts और संबंधित messages।
  • लंबित जाँच की सूची और प्रत्येक रिकॉर्ड की प्रासंगिकता।
  • प्रक्रिया के अनुसार आवश्यक affidavit और annexures।

कोर्ट से क्या अनुरोध किया जा सकता है?

विवेचक से जाँच की स्थिति रिपोर्ट मँगाई जाए तथा शिकायत से संबंधित bank और digital records सुरक्षित कराकर वास्तविक fund trail की निष्पक्ष जाँच सुनिश्चित करने के उचित निर्देश दिए जाएँ। आवश्यकता के अनुसार स्वतंत्र विशेषज्ञ सहायता पर विचार किया जाए।

90 दिन के भीतर Progress Update

BNSS धारा 193(3)(ii) में informant या victim को 90 दिनों के भीतर जाँच की प्रगति बताने का प्रावधान है। इसका अर्थ प्रत्येक financial case में 90 दिनों के भीतर जाँच पूरी करना नहीं है। साक्ष्य नष्ट होने का तत्काल खतरा हो तो अपनी शिकायत या आवेदन देने के लिए 90 दिन प्रतीक्षा करना जरूरी नहीं है।

यदि FIR ही दर्ज नहीं हुई है

BNSS धारा 173(4) के अनुसार संबंधित SP को लिखित शिकायत भेजी जा सकती है। राहत न मिलने पर आवश्यक affidavit और पहले किए गए प्रयासों के प्रमाण सहित Magistrate के सामने धारा 175(3) के अंतर्गत आवेदन किया जा सकता है।

संदर्भ: NCRB — BNSS का पाठ | BPR&D — Investigation Progress की SOP

पुलिस कार्रवाई नहीं कर रही, शिकायतकर्ता के अधिकार, Magistrate application, BNSS 175(3), investigation status report

FIR के बाद जाँच में देरी हो तो क्या करें?

IO और थाना प्रभारी को लिखित आवेदन दें

वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को शिकायत कैसे भेजें?

शिकायतकर्ता Magistrate के सामने कैसे जाए?

आवेदन के साथ जरूरी दस्तावेज

लंबित जाँच और महत्वपूर्ण साक्ष्यों की सूची

आवेदन की प्राप्ति और Delivery Proof सुरक्षित रखें

कोर्ट से जाँच की स्थिति रिपोर्ट और उचित निर्देश की माँग

जाँच की प्रगति के 90 दिन वाले प्रावधान का अर्थ

FIR दर्ज नहीं होने और जाँच में देरी में अंतर

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या शिकायतकर्ता जाँच की प्रगति पूछ सकता है?

क्या कोर्ट जाने से पहले वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को लिखना चाहिए?

क्या हर मामले में Forensic Audit जरूरी है?